राजस्थान का प्रजामंडल आंदोलन: कारण, विकास, प्रमुख नेता, किसान–आदिवासी आंदोलन और ऐतिहासिक महत्व
⭐ राजस्थान का प्रजामंडल आंदोलन
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🌿 प्रस्तावना
राजस्थान का इतिहास
वीरता, त्याग तथा जन–जागरण की अद्भुत
गाथा से भरा
हुआ है। जिस
प्रकार भारत ने
अंग्रेजी शासन से
मुक्ति पाने के
लिए लंबा स्वतंत्रता
संघर्ष किया, उसी प्रकार
राजस्थान के राजतंत्र–शासित रियासतों के
लोगों ने भी
सामंती शासन, अत्याचार, कर–व्यवस्था, वेतनहीन बेगार,
और जन–दमन
के विरुद्ध एक
अनोखा संघर्ष किया—जिसे इतिहास
में “राजस्थान का
प्रजामंडल आंदोलन” कहा जाता
है।
यह आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय
आंदोलन का प्रतिबिंब
तो था ही,
परंतु यह केवल
अंग्रेजी शासन के
विरुद्ध नहीं था।
यह इन समस्याओं
के विरुद्ध भी
था—
562 देशी रियासतों
में फैला शोषण
राजाओं की निरंकुश
नीतियाँ
लगान–कर
और बेगार
किसानों–स्त्रियों–श्रमिकों
पर अत्याचार
शिक्षा और नागरिक
अधिकारों का अभाव
यह आंदोलन राजस्थान की
जनता की राजनीतिक
चेतना, आत्मसम्मान और स्वशासन
की माँग का
प्रतीक था।
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🌍 राजस्थान
का राजनीतिक सामाजिक
परिदृश्य (1857–1930)
राजस्थान स्वतंत्रता आंदोलन से
अलग-थलग था
क्योंकि—
यह देशी
रियासतों का क्षेत्र
था
यहाँ अंग्रेज
सीधे शासन नहीं
करते थे
देसी राजाओं
के पास पूर्ण
अधिकार थे
जनता के
अधिकार शून्य थे
👉 राजस्थान 19वीं
सदी की शुरुआत
तक पूरी तरह
सामंती समाज था।
राजा–ठाकुरों का शासन,
लगान वसूली, जंगल–चराई कर,
बाजरी–कण कर,
विवाह कर, जल
कर, और यहाँ
तक कि “सिराना
कर” (सिर ढँकने
का कर) तक
चलता था।
किसानों के लिए
जीवन बेहद कठिन
था।
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🔥 प्रजामंडल
आंदोलन क्यों शुरू हुआ?
(मुख्य कारण)
राजस्थान के प्रजामंडल
आंदोलन की नींव
इन आधारों पर
पड़ी—
1️⃣ सामंती शोषण
किसानों पर अत्यधिक
कर
बेगार प्रथा
जंगल–चराई
कर
जजमानी व्यवस्था
अकाल और
सूखे के समय
भी कर वसूली
2️⃣ राजाओं की निरंकुशता
जनता पर
कोई अधिकार नहीं
बोलने की स्वतंत्रता
नहीं
प्रेस पर पूर्ण
प्रतिबंध
राजा की
बात अंतिम आदेश
3️⃣ शिक्षा व सामाजिक
पिछड़ापन
शिक्षा केवल शाही
परिवारों तक
किसान, दलित, महिलाएँ—सभी शिक्षाहीन
1900 तक राजस्थान
में 10% से भी
कम साक्षरता
4️⃣ राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव
गांधी, नेहरू, पटेल,
सुभाष चंद्र बोस
जैसा नेतृत्व
स्वराज, स्वशासन की
मांग
कांग्रेस के सिद्धांत
राजस्थान में पहुँचे
5️⃣ युवा वर्ग का
जागरण
विदेश से पढ़कर
आए युवाओं ने
नई राजनीति शुरू
की
जन–सभाएँ,
आंदोलन, संगठन बनने लगे
इन परिस्थितियों से परेशान
जनता स्वराज्य चाहती
थी।
और इसी के
साथ जन्म हुआ—
👉 प्रजामंडलों का।
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🏛️ प्रजामंडल
क्या था?
प्रजामंडल
= प्रजा + मंडल = जनता का
संगठन
यह भारत की
स्वतंत्रता के समानांतर,
राजस्थान की जनता
द्वारा अपनी रियासतों
में लोकतांत्रिक अधिकार,
नागरिक स्वतंत्रता, करों में
सुधार आदि की
माँग के लिए
गठित जन–संगठन
थे।
राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1927 में
देशी रियासतों में
प्रजा–अधिकार आंदोलन
चलाने का निर्णय
लिया।
इसी निर्णय के बाद
राजस्थान में भी
विभिन्न रियासतों में प्रजामंडलों
का गठन होने
लगा।
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🎯 प्रजामंडल
आंदोलन के मुख्य
उद्देश्य
| उद्देश्य | विवरण |
| ------------------------ |
--------------------------------------- |
| 1. नागरिक
अधिकार | बोलने,
लिखने, सभा करने
की आज़ादी |
| 2. करों में सुधार | अतिवादी
कर, लगान, बेगार
समाप्त |
| 3. शिक्षा
का प्रसार | जनता की
शिक्षा और सामाजिक
जागरण |
| 4. न्यायिक
सुधार | राजा
के बजाय जन–न्याय प्रणाली
|
| 5. प्रतिनिधि
सरकार | जनता
के प्रतिनिधियों की
भागीदारी |
| 6. सामंती
अत्याचार रोकना | किसानों, दलितों
पर दमन समाप्त |
| 7. प्रजा–स्वराज | रियासतों
से राजाओं के
एकाधिकार दूर करना
|
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🛕 राजस्थान
में प्रजामंडलों की
स्थापना (मुख्य क्रम)
राजस्थान के विभिन्न
क्षेत्रों में अलग-अलग समय
पर प्रजामंडल बने।
सबसे प्रमुख प्रजामंडल ये
थे—
1. जयपुर प्रजामंडल – 1931
2. जैसलमेर
प्रजामंडल – 1936
3. मारवाड़
हितकारिणी सभा (जोधपुर)
– 1924
4. बीकानेर
प्रजामंडल – 1937
5. कोटा प्रजा परिषद – 1938
6. उदयपुर प्रजामंडल (मेवाड़) – 1938
7. भरतपुर प्रजामंडल – 1939
8. अलवर प्रजामंडल – 1938
9. डूंगरपुर–बंसवाड़ा–सिरोही आदिवासी
प्रजामंडल – 1940 के बाद
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🔥 जयपुर प्रजामंडल
🔥 मेवाड़ प्रजामंडल
आंदोलन
🔥 जोधपुर – बीकानेर
– कोटा – अलवर के
आंदोलन
🔥 किसानों के
बड़े आंदोलन (बेगूँ,
बिलोली, नीमूचाना, माजरा)
🔥 आदिवासी आंदोलनों
(भील, गरासिया, डूंगरिया
क्रांति)
🔥 महिला आंदोलन
🔥 दलित चेतना
और आंदोलन
🔥 राजस्थान के
प्रजामंडल आंदोलन के प्रमुख
नेता
🔥 जनता–राजा
संघर्ष
🔥 1942 भारत छोड़ो
आंदोलन में राजस्थान
की भूमिका
🔥 एकीकरण की
ओर कदम
🔥 राजस्थान राज्य
का निर्माण (1948–1956)
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1. मेवाड़ प्रजामंडल आन्दोलन
(उदयपुर)
यह राजस्थान के सबसे
प्रभावशाली आंदोलनों में से
था।
नेता
मनिक्यलाल वर्मा
श्याम नंदन सहाय,
नारायणलाल भास्कर,
हार्डायाल सिंह
मुख्य घटनाएँ
a) 1928 – मेवाड़ प्रजा मण्डल
की स्थापना
राजा भूपाल सिंह के
शासन में जनता
त्रस्त थी।
कांग्रेस से प्रेरित
युवा कार्यकर्ताओं ने
संगठन बनाया।
b) अखबार 'मेवाड़ हितैषी'
और 'लोकमत'
इन पत्रों ने बेगार,
कर, भ्रष्टाचार और
अन्याय के खिलाफ
लेख छापे।
c) बेगार उन्मूलन आन्दोलन
मेवाड़ में बेगार
की स्थिति अमानवीय
थी।
प्रजामंडल नेताओं ने गाँव-गाँव जाकर
जनता को संगठित
किया।
d) गांधीजी की प्रेरणा
गांधीजी स्वयं मेवाड़ के
आंदोलन पर नजर
रखते थे।
उन्होंने दमन नीतियों
पर कई बार
मेवाड़ राजशाही को पत्र
लिखा।
e) 1939 – दमन और
गिरफ्तारी
सैकड़ों कार्यकर्ताओं को जेल
में डाला गया।
f) 1946 – प्रजामंडल की बड़ी
सफलता
बेगार प्रथा समाप्त हुई।
लोकशाही की दिशा
में कदम बढ़ा।
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2. जयपुर प्रजामंडल आन्दोलन
राजस्थान का सबसे
संगठित और प्रभावशाली
आंदोलन माना गया।
मुख्य नेता
रामकरण जोशी
बाबू जगननाथ
शर्मा
कैलाशपति मिश्र
कन्हैयालाल सेठिया
हरीदेव जोशी
मुख्य घटनाएँ
a) 1931 – जयपुर प्रजामंडल की
स्थापना
राजा मानवेंद्र सिंह का
शासन तानाशाही और
कर व्यवस्था से
भरा था।
b) राजा का
दमन
राजा ने प्रजामंडल
पर पाबंदियाँ लगा
दीं।
सभा, जुलूस, पत्र-पत्रिकाएँ—सब बंद।
c) 1939 – बड़े पैमाने
पर पासबान आन्दोलन
जनता ने “पासबान”
नामक संगठन के
माध्यम से सत्याग्रह
किया।
d) 1942 भारत छोड़ो
आन्दोलन का प्रभाव
जयपुर में व्यापक
गिरफ्तारियाँ हुईं।
छात्र, व्यापारी, किसान सब
जुड़े।
e) 1947 – लोकतंत्र की स्थापना
की माँग
स्वतंत्रता
के साथ जयपुर
में लोकतांत्रिक सुधार
लागू हुए।
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3. जोधपुर प्रजामंडल आन्दोलन
नेता
जैल सिंह,
जय नारायण
व्यास
नारायण हरि सिंह
घटनाएँ
1934 में प्रजामंडल
गठन
बेगार विरोधी आंदोलन
किसानों पर अत्याचार
का विरोध
1942 आंदोलन में महत्वपूर्ण
भूमिका
स्वतंत्रता के बाद
जोधपुर भारत में
विलय का संकट
(जिसमें व्यास जी की
महत्वपूर्ण भूमिका रही)
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4. बीकानेर प्रजामंडल
नेता
नारायण सिंह,
कन्हैयालाल सेठिया,
छोटूदास
मुख्य आंदोलन
किसान जागरण
करों का
विरोध
बेगार के खिलाफ
संघर्ष
शिक्षित युवाओं द्वारा
राष्ट्रीय चेतना का प्रसार
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5. शेखावाटी किसान आन्दोलन
(सीकर, झुंझुनू)
यह आन्दोलन प्रजामंडल का
सबसे युद्धरत रूप
था।
नेता
सरदार हरलाल सिंह
शेखावाटी किसान सभा
जगत नारायण
मुख्य मुद्दे
बढ़ते कर
किसान की जमीन
पर कब्जा
ठिकानेदारों का अत्याचार
बेगार और बंधुआ
मजदूरी
सीकर के आंदोलन
के कारण राजा
को अंततः करों
में कमी करनी
पड़ी।
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6. भरतपुर और अलवर
प्रजामंडल
भरतपुर और अलवर
में राजा के
कारिंदों द्वारा—
महिलाओं के प्रति
अत्याचार
अत्यधिक कर
राजनैतिक विरोधियों की
हत्या-गिरफ्तारी
मुस्लिम-हिन्दू तनाव
जैसी समस्याएँ थीं।
नेताओं—यशपाल, सेठी, किशनलाल—ने जागरण
किया।
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अध्याय 5 प्रजामंडल आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ
यह राजस्थान के अन्य
आंदोलनों से अलग
था। इसकी मुख्य
विशेषताएँ थीं—
1. अहिंसा पर आधारित
गांधीवादी पद्धति अपनाई गई—सत्याग्रह, उपवास, जुलूस,
सभाएँ।
2. किसानों-मजदूरों का
बड़ा समर्थन
बेगार और करों
के कारण वे
सबसे ज्यादा जुड़े।
3. जाति-धर्म
से ऊपर उठकर
संयुक्त आंदोलन
राजस्थान की विविध
जातियाँ—जाट, राजपूत,
मीणा, ब्राह्मण, गुर्जर—सभी जुड़े।
4. महिलाओं की भागीदारी
कई रियासतों में महिलाओं
ने मोर्चे संभाले।
5. विद्यार्थी आंदोलन
जयपुर और जोधपुर
में छात्र सबसे
ज्यादा सक्रिय थे।
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अध्याय 6
राजाओं ने आंदोलन
को कुचलने के
लिए—
प्रजामंडलों पर प्रतिबंध
नेताओं की गिरफ्तारियाँ
सभा-जुलूस
पर रोक
गोलीबारी
संपत्ति जब्ती
निर्वासन
जैसी कठोर नीतियाँ
अपनाईं।
लेकिन दमन जितना
बढ़ा, आंदोलन उतना
ही फैलता गया।
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अध्याय 7
छात्रों ने कॉलेज
छोड़े
कस्बों में जुलूस
निकले
कई स्थानों
पर पुलिस फायरिंग
नेताओं ने भूमिगत
रहकर आंदोलन चलाया
अंग्रेजों को पहली
बार रियासतों में
व्यापक विरोध का सामना
करना पड़ा
इससे प्रजामंडल आंदोलन राष्ट्रीय
संघर्ष का हिस्सा
बन गया।
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अध्याय 8
स्वतंत्रता के बाद मुख्य प्रश्न था—
क्या राजस्थान की रियासतें
भारत में मिलेंगी
या स्वतंत्र रहना
चाहेंगी?
कई राजाओं ने शुरू
में टाल-मटोल
की, कुछ विलय
के पक्ष में
थे, कुछ नहीं।
प्रजामंडल नेताओं ने जनता
की ओर से
विलय का जोरदार
समर्थन किया।
कई जगह जनमत
संग्रह हुआ और
जनता पूरी तरह
भारत में विलय
के पक्ष में
रही।
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अध्याय 9
राजस्थान का गठन
7 चरणों में हुआ।
प्रजामंडल नेताओं ने इन
चरणों में—
जनता को
जागरूक किया
राजाओं पर दबाव
बनाया
लोकतंत्र स्थापित करने
में मदद की
अंततः 1 नवंबर 1956 को सम्पूर्ण
राजस्थान का एकीकरण
पूरा हुआ।
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अध्याय 10
सबसे बड़ा योगदान।
2. करों में
सुधार
अन्यायपूर्ण
कर हटाए गए।
3. राजाओं की मनमानी
समाप्त
लोकतंत्र का मार्ग
खुला।
4. राजनीतिक चेतना
ग्रामीण जनता पहली
बार अधिकारों के
बारे में जान
पाई।
5. भारत में
विलय
रियासतों को भारत
में मिलाने में
प्रजामंडल नेताओं का निर्णायक
योगदान रहा।
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अध्याय 11
अनेक स्थानों
पर संगठन कमजोर
शिक्षा की कमी
आपसी मतभेद
सामन्ती दमन बहुत
मजबूत था
लेकिन फिर भी
आंदोलन अपने लक्ष्य
में सफल रहा।
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निष्कर्ष
राजस्थान का प्रजामंडल
आन्दोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
का अविभाज्य हिस्सा
है।
यह एक ऐसा
जनसंघर्ष था जिसने—
सामन्ती शासन की
जंजीरों को तोड़ा
जनता को
अधिकारों के प्रति
जागरूक किया
रियासतों को राष्ट्रीय
धारा से जोड़ा
और अंततः
लोकतांत्रिक राजस्थान की नींव
रखी
यदि यह आंदोलन
नहीं होता, तो
राजस्थान में लोकतंत्र
की स्थापना इतनी
जल्दी नहीं हो
पाती।
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