त्रिनेत्र श्री गणेश मंदिर का परिचय

त्रिनेत्र  गणेशजी का पवित्र स्थल 

हेलो फ्रेंड्स में शिवा तुनगरिया आपके लिए लेकर आया हूँ एक जबरदस्त जानकारी जिसे जानकर आपका भी मन मेरी तरह खुश हो जाएगा। 


में आज आपको भारत में स्थित राजस्थान राज्य के सवाईमाधोपुर जिले के रणथम्भौर में स्थित भगवान श्री त्रिनेत्र गणेश जी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बाते जो शायद आप जान भी सकते हो और नहीं भी। 

हमारे भारत देश में श्री गणेश जी के चार प्रसिद्द मंदिर है जिनमे से प्रथम स्थान पर रणथम्भौर वाला मंदिर आता है।  इसे प्रथम स्थान क्यों प्राप्त है इसका पता आपको आगे चल जाएगा। 

यह मंदिर विश्व का एकमात्र मंदिर है जहा पर श्री गणेश जी अपने पूरे परिवार के साथ है। इस मंदिर में गणेश जी की प्रतिमा स्वयंभू प्रकट है। इसे रण्थभंवर भी कहा जाता है। क्योकि रण = पहाड़ी , थम्ब = उचाई , भौर = नाला - इसलिए इसका नाम  रणथम्भौर  पड़ा। यह मंदिर 1579 फिट उचाई पर अरावली और विंद्याचल की पहाड़ियों में स्थित है। 

अगर घर में शुभ कार्य हो तो प्रथम पूज्य श्री गणेश जी को निमंत्रण यही पर भेजा जाता है। ये सबसे बड़ी खासियत है यहाँ की। 

अगर कोई भक्त परेशानी में हे तो उसे दूर करने के लिए भक्त अपनी अरदास यहाँ पत्र भेजकर लगाते है। अगर हम डाक और चिट्टियो की बात करे तो यहाँ पर रोज़ाना हज़ारो डाक और चिट्टिया पहुँचती है। ऐसा इसलिए क्योकि यहाँ सच्चे मन से मांगी मुराद जरूर पूरी होती है।  

राजा हम्मीर देव चौहान और अल्लाउद्दीन खिलजी के युद्ध (1299 -1301 )के दौरान 9 महीने से भी ज्यादा समय तक यह किला दुश्मनो ने घेरे रखा। दुर्ग में राशन सामग्री समाप्त होने लगी तब गणेश जी ने हम्मीर देव चौहान को स्वपन में दर्शन दिए और उस स्थान पर पूजा करने के लिए कहा जहा आज यह गणेश जी की प्रतिमा है। हम्मीर देव वह पहुंचे तो उन्हें वह स्वयंभू प्रकट गणेश जी की प्रतिमा मिली। राजा हम्मीर देव ने फिर वही पर मंदिर का निर्माण करवाया।

त्रिनेत्र गणेश जी का उल्लेख रामायण और द्धापर युग में भी मिलता है। कहा जाता है की लंका कुछ से पहले भगवान राम ने गणेश जी के इसी रूप का अभिषेक किया था। एक और मान्यता के अनुसार द्धापर युग में भगवान कृष्ण का विवाह रूक्मणी से हुआ था। इस विवाह में कृष्ण जी गणेश को बुलाना भूल गए थे। तब गणेश जी ने क्रोध में आकर अपने वाहन मूषको को भगवान कृष्ण के रथ के चारो और बिल करने का आदेश दिया और मूषको ने वैसा ही किया ऐसा करने से भगवान् कृष्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया कृष्ण जी के पूछने पर मूषको ने गणेश जी के क्रोध का कारन बताया तब भगवान् कृष्ण को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने गणेश जी को मनाया। तब से गणेश जी को  हर मंगल कार्य करने से पहले  पूजा  जाता है। श्री कृष्ण ने जहा गणेश जी को मनाया था वह स्थान रणथम्भौर था। यही कारन है की रणथम्भौर गणेश जी को भारत का प्रथम गणेश जी कहते है।  मान्यता है की राजा विक्रमादित्य भी हर बुधवार को यहाँ पूजा करने आते थे। 

इस मंदिर में भगवान गणेश जी त्रिनेत्र रूप में विराजमान है। जिसमे तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतिक है। 

देश में चार स्वयंभू गणेश के मंदिर माने जाते है जिनमे रणथम्भौर स्थित त्रिनेत्र गणेशजी प्रथम है। इस मंदिर के अलावा सिध्दपुर गणेश मंदिर (गुजरात ), अवंतिका गणेश मंदिर (उज्जैन ),और सिध्दपुर सिहोर मंदिर (मध्यप्रदेश ) में स्थित है। यहाँ भाद्रपद शुक्ल की चतुर्दशी को मेला आयोजित होता है जिसमे लाखो भक्त गणेशजी के दरबार में हाजिरी लगाने आते है।  इस दौरान यहाँ पूरा इलाका गजानन के जयकारो से गूंज उठता है।  भगवान् त्रिनेत्र गणेश जी की परिक्रमा लगभग 7 किलोमीटर की है। 

रणथम्भौर गणेशजी का मंदिर प्रसिद्द रणथम्भौर टाइगर रिजर्व एरिया में स्थित है।  यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता देखते ही बनती है। बारिश के दौरान यहाँ कई झरने फुट  पड़ते है और  पूरा इलाका रमणीय हो जाता है। यह मंदिर  किले में   स्थित है और यह किला एक संरक्षित धरोहर है। 



हां तो दोस्तों कैसी लगाई आपको ये पोस्ट आशा करता हूँ पसंद आयी होगी मिलते है दोस्तों अगली पोस्ट में। 

धन्यवाद 


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